
संवाददाता
कानपुर। उत्तर प्रदेश की सियासी फिजा में इन दिनों सामाजिक तालमेल और सुशासन की चर्चाओं के बीच बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने एक मिसाल पेश की। कानपुर नगर के बिठूर विधानसभा क्षेत्र अंतर्गत ग्राम पिपौरी स्थित मदरसा दावत उल हक में सोमवार को एक भव्य “सर्वजन रोजा इफ्तार पार्टी” का आयोजन किया गया।
पार्टी के पूर्व मंडल संयोजक असलम राज के आतिथ्य में आयोजित इस कार्यक्रम में सियासी और सामाजिक समीकरणों की एक अनूठी तस्वीर देखने को मिली। इफ्तार की इस महफिल में मुख्य अतिथि के तौर पर कई मंडलों के प्रभारी नौशाद अली ने शिरकत की, जबकि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं ने धर्मनिरपेक्ष एकता की इस मिसाल में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
इस अवसर पर पार्टी के पूर्व प्रत्याशी एवं वरिष्ठ नेता देवी प्रसाद तिवारी, वरिष्ठ दलित चेहरा बी.आर. अहिरवार, पूर्व जिलाध्यक्ष बबलू चौधरी, वर्तमान जिलाध्यक्ष कुलदीप गौतम, हरि नारायन कुशवाहा, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष नरेश कुरील, भीम कुमार गौतम, मोहन राम, दीप सिंह सहित तमाम गणमान्य कार्यकर्ता उपस्थित रहे।
इफ्तार के बाद परिचर्चा: जब मायावती के शासनकाल के किस्से हुए ताजा
रोजेदारों के साथ इफ्तार कराने के बाद सामयिक राजनैतिक परिदृश्य और सुशासन विषय पर एक विशेष परिचर्चा आयोजित की गई। इस दौरान वक्ताओं ने मौजूदा हालातों पर गहरी चिंता व्यक्त की और बसपा प्रमुख मायावती के शासनकाल को एक आदर्श मॉडल के रूप में पेश किया।
परिचर्चा की शुरुआत करते हुए पूर्व जिलाध्यक्ष बबलू चौधरी ने कहा कि,
“आज के राजनैतिक परिदृश्य में सामाजिक उथल-पुथल साफ देखी जा सकती है। एक ओर महंगाई और बेरोजगारी ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है, तो दूसरी ओर भ्रष्टाचार ने नए कीर्तिमान स्थापित कर लिए हैं। सरकारी तंत्र में पारदर्शिता खत्म हो गई है और प्रशासनिक नाकामी के चलते आम जनता का भरोसा उठ गया है।”
उन्होंने कहा कि जनता आज उस सुशासन को तरस रही है, जो कभी उत्तर प्रदेश में मायावती के कार्यकाल में देखने को मिलता था। उन्होंने जोर देकर कहा:
आज सरकारी से लेकर निजी कार्यालयों में जब भी चर्चा होती है, लोग मायावती जी के शासनकाल को याद करते हैं। वह दौर प्रशासनिक सख्ती, त्वरित निर्णय और कानून के राज का प्रतीक था। दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्गों को न सिर्फ सुरक्षा का अहसास था, बल्कि सम्मान के साथ जीने का हक भी मिला था।
प्रशासनिक अनुशासन से लेकर सामाजिक न्याय तक: मायावती मॉडल की बढ़ती तस्दीक
परिचर्चा में आगे बताया गया कि उत्तर प्रदेश की नौकरशाही में आज एक बार फिर मायावती युग की चर्चा जोरों पर है। सेवानिवृत्त और वरिष्ठ अधिकारी भी यह स्वीकार कर रहे हैं कि उस समय प्रशासन में अनुशासन की जो लाइन थी, वह आज लगभग गायब हो चुकी है।
मायावती के कार्यकाल में माफिया और अपराधियों के लिए राजनीतिक संरक्षण के दरवाजे बंद थे। कानून सबके लिए बराबर था, जिसका सीधा असर जमीन पर दिखता था। उनके शासन में भ्रष्टाचार के मामलों में किसी भी पद या हैसियत वाले अफसर को बख्शा नहीं जाता था, जिससे अधिकारियों में जवाबदेही का भाव प्रबल रहता था।
सत्ता और प्रशासन के बीच एक स्पष्ट रेखा थी। अधिकारियों को बिना किसी राजनीतिक दबाव के नियमों के तहत काम करने की स्वतंत्रता थी। पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों को केवल योजनाएं ही नहीं, बल्कि सम्मान और सुरक्षा भी मिली।
वक्ताओं ने कहा कि प्रदेश में जब भी सुशासन का मापदंड तय होगा, मायावती का कार्यकाल हर बार एक कसौटी की तरह सामने आएगा। उन्होंने यह साबित कर दिया कि राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो सरकार भ्रष्टाचार, जातिगत टकराव और अराजकता से मुक्त हो सकती है।
इस दौरान वक्ताओं ने आम जनता से अपील की कि वह मौजूदा हालातों की समीक्षा करें और बसपा को फिर से मौका देकर प्रदेश को सुशासन की उसी ऊंचाई पर ले जाएं, जहां हर नागरिक सुरक्षित और सम्मानित महसूस करता हो।






