February 24, 2026

· उपाध्यक्ष राकेश मिश्रा के खिलाफ हितों के टकराव के मामले में बीसीसीआई लोकपाल ने जारी किया नोटिस

संवाददाता
लखनऊ/कानपुर।  उत्तर प्रदेश क्रिकेट संघ (यूपीसीए) में चयन धांधली और पद के दुरुपयोग के एक गंभीर मामले में बीसीसीआई लोकपाल न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा ने हस्तक्षेप किया है। कई बार की शिकायतों के बाद  उन्‍होंने यूपीसीए के खिलाफ पहली बार किसी को नोटिस जारी कर अपना पक्ष रखने के निर्देश दिए हैं।लोकायुक्‍त अरुण मिश्रा ने उपेन्‍द्र यादव की शिकायत पर ध्‍यान केन्द्रित करते हुए माना है कि यूपीसीए की चयन समिति से लेकर सीईओ सचिव कोषाध्‍यक्ष,ने अपने-अपने पदों का दुरुपयोग करते हुए एक पदाधिकारी के पुत्र को टीम में शामिल करवाने का काम किया है। यही नही उपाध्यक्ष राकेश मिश्रा पर अपने पुत्र नलिन मिश्रा को बिना किसी ट्रायल और बिना उचित प्रक्रिया के उत्तर प्रदेश की रणजी ट्रॉफी टीम में शामिल कराकर नियमों को उल्‍लंघन किया है। इस मामले में लोकपाल ने राकेश मिश्रा सहित यूपीसीए के तमाम पदाधिकारियों और सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।शिकायतकर्ता उपेंद्र यादव ने बताया कि लोकपाल के समक्ष 20 जनवरी 2026 को शिकायत दर्ज कराई गई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि यूपीसीए के उपाध्यक्ष राकेश मिश्रा ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए अपने बेटे नलिन मिश्रा को रणजी टीम में शामिल कराया, जबकि वह न तो कभी ट्रायल में दिखे और न ही यूपीसीए में खिलाड़ी के रूप में पंजीकृत हैं। यह कृत्य बीसीसीआई और यूपीसीए के संविधान के नियम 38 (हितों का टकराव) और सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का सीधा उल्लंघन है।इस शिकायत को गंभीरता से लेते हुए, लोकपाल न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा ने 20 फरवरी 2026 को लखनऊ में प्रारंभिक सुनवाई की। सुनवाई के दौरान मामले की गंभीरता को देखते हुए लोकपाल ने राकेश मिश्रा (उपाध्यक्ष, यूपीसीए) को भी पक्षकार बनाते हुए उन्हें नोटिस जारी किया है। साथ ही यूपीसीए के सीईओ अंकित चटर्जी द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण पत्र को भी नोटिस का विषय बनाया गया है।उपेंद्र यादव ने कहा, “हम न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा का आभार व्यक्त करते हैं कि उन्होंने इस मामले को संज्ञान में लिया और यूपीसीए के उपाध्यक्ष राकेश मिश्रा को नोटिस जारी किया। यह सिर्फ एक व्यक्ति का मामला नहीं है, बल्कि यह उत्तर प्रदेश के उन हजारों युवा क्रिकेटरों के साथ न्याय का सवाल है जो मेहनत करने के बावजूद पहचान नहीं पाते। यदि किसी पदाधिकारी का बेटा सीधे टीम में घुस सकता है, तो इससे चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता पूरी तरह समाप्त हो जाती है।यादव ने आगे बताया कि लोकपाल ने यूपीसीए से पिछले सात वर्षों के प्रदर्शन और चयन से जुड़े रिकॉर्ड मांगे हैं, ताकि सच्चाई का पता लगाया जा सके। अब मामले में सभी पक्षों को दो सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करना है। उसके बाद अगली सुनवाई की तारीख तय की जाएगी।शिकायतकर्ता ने मांग की है कि राकेश मिश्रा के खिलाफ कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए और यूपीसीए की चयन प्रक्रिया की पारदर्शी जांच कराई जाए, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं पर रोक लग सके। यूपीसीए से जुडे एक पूर्व पदाधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि लोकायुक्‍त अरुण मिश्रा को केवल राकेश मिश्रा के नाम पर ही असहमति जताई है जबकि कई बार अन्‍य लोगों की शिकायत की गयी है लेकिन कभी सुनवाई तक नही की गयी। ऐसा प्रतीत होता है कि हाईकमान से मंजूरी मिलने  के बाद ही लोकायुक्‍त ने कार्रवाई की है। अब देखना यह है कि लोकायुक्‍त अगली कितनी शिकायतों पर सुनवाई करेंगे।

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