April 10, 2026

संवाददाता 

कानपुर। नगर में पकड़े गए किडनी रैकेट के शिकार हुए छात्र आयुष ने बताया कि मेरे पिता की 2 साल पहले मौत हो चुकी है। घर में मां और एक बहन है। बहन की पढ़ाई और शादी की जिम्मेदारी मुझ पर है। मैं अपनी कॉलेज फीस भी जमा नहीं कर पा रहा था। मुझे अपना भविष्य  अंधकार में जाता दिखाई दे रहा था। इस दौरान मुझे शिवम अग्रवाल मिला।
उसने किडनी डोनेट करने के लिए मोटिवेट किया। शिवम कहता था कि फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन 43 साल से एक किडनी की बदौलत जिंदा हैं। 83 साल की उम्र में भी वह फिल्मों में काम कर रहे हैं। प्रेमानंद महाराज की भी दोनों किडनियां खराब हैं, उन्हें भी कुछ नहीं हुआ…।
मुझे एंबुलेंस चलाने वाले शिवम की बातें सही लगने लगीं। वह कहता था कि परिवार का इकलौता सहारा हो, एक किडनी के एवज में परिवार को गरीबी के मुंह से बाहर निकाल सकते हो। परिवार को अच्छी जिंदगी देने के लिए मैंने किडनी बेचने का मन बना लिया।’
यह कहना है बिहार के समस्तीपुर के रहने वाले एमबीए चौथे वर्ष के  स्टूडेंट आयुष का। किडनी डोनेट करने वाला आयुष कानपुर के हैलेट में भर्ती है। हैलेट जाने से पहले मेड इन लाइफ अस्पताल में भर्ती था। जहां उसने आईपीएस  सुमेध जाधव से रोते हुए यह दर्द बयां किया है।
कानपुर किडनी कांड में शिवम समेत 6 लोग गिरफ्तार किए जा चुके हैं। पुलिस के मुताबिक, 8वीं पास शिवम ही गैंग का सरगना है।
आयुष ने बताया है कि  शिवम अग्रवाल का एक साथी है, जिसने कहा था कि किडनी बेचोगे तो मुंहमांगे दाम मिलेंगे। उसने टेलीग्राम पर एक ग्रुप में लिखी चैट भी दिखाई। उसमें लिखा था कि बी+ ब्लड ग्रुप की महिला को किडनी चाहिए। उसी युवक ने मेरी मुलाकात शिवम से कराई थी।
शिवम ने मेरा ब्रेनवॉश किया। मेरे परिवार के बारे में मुझसे सारी जानकारी ली। फिर कहने लगा कि एक किडनी बेच दो, सारे दुख-दर्द दूर हो जाएंगे। मैंने कहा कि सोचकर बताऊंगा। फिर शिवम मुझे लगातार मैसेज भेजने लगा और फोन कॉल करने लगा। कुछ दिनों बाद मेरी शिवम से दोबारा मुलाकात हुई। मैंने किडनी डोनेट करने से मना कर दिया।
उसने पूछा दिक्कत क्या है, डर रहे हो क्या? परेशान क्यों हो? फिल्म ‘कुली’ के दौरान अमिताभ बच्चन को भी चोट लगी थी। उनकी एक किडनी में इंफेक्शन हो गया था, लेकिन वह आज भी पूरी तरह फिट हैं। फिल्मों में खूब काम कर रहे हैं। प्रेमानंद महाराज की भी तो दोनों किडनियां खराब हैं। तुम अभी पूरी तरह से जवान हो, एक किडनी देने से कुछ नहीं होगा।
आयुष का कहना है कि शिवम के समझाने पर मैंने किडनी डोनेट करने का मन बना लिया। मैंने 3 दिन बाद शिवम को फोन किया, तो उसने आहूजा हॉस्पिटल बुलाया। हॉस्पिटल में पहुंचने पर कहा गया कि 5 लाख मिलेंगे। मेरे मना करने पर रकम और बढ़ाई गई। फिर 9.50 लाख रुपए देने की बात कही। इसके बाद 29 मार्च की रात मेरा ऑपरेशन किया गया। मैं परिवार से झूठ बोलकर कानपुर आया था। मां से कहा था कि पेपर देने जा रहा हूं, 3 दिन बाद आऊंगा।
कानपुर में पुलिस ने अवैध किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट पकड़ा था। बिहार के रहने वाले एक 23 साल के एमबीए छात्र से उसकी किडनी 6 लाख रुपए में खरीदी गई। बाद में 30 साल की महिला मरीज को करीब 80 लाख रुपए में बेच दी गई।
किडनी देने वाले छात्र ने पुलिस से शिकायत की, तो पुलिस ने  मेड लाइफ हॉस्पिटल, आहूजा हॉस्पिटल और प्रिया हॉस्पिटल में एक साथ छापेमारी की। मेड लाइफ हॉस्पिटल में किडनी डोनर एमबीए छात्र आयुष भर्ती मिला। जब ट्रांसप्लांट से जुड़े दस्तावेज मांगे गए, तो अस्पताल कोई वैध कागजात पेश नहीं कर सका।
पुलिस ने 31 मार्च को आहूजा हॉस्पिटल की मालकिन डॉ. प्रीति आहूजा, उनके पति डॉ. सुरजीत, डॉ राजेश कुमार, डॉ. राम प्रकाश, डॉ. नरेंद्र सिंह और दलाल शिवम अग्रवाल को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।
डॉ. प्रीति और उनके पति डॉ. सुरजीत आहूजा नवीन नगर के रहने वाले हैं। डॉ. प्रीति एमडी मेडिसिन, जबकि डॉ. सुरजीत एमडी पैथोलॉजी हैं। इनका कल्याणपुर में आहूजा हॉस्पिटल है। पुलिस के मुताबिक, अब तक इस हॉस्पिटल में किडनी के 7 से 8 ऑपरेशन कराए गए हैं। सभी ऑपरेशन देर रात कराए जाते थे। ऑपरेशन के बाद मरीजों को दूसरे हॉस्पिटल में शिफ्ट कर दिया जाता था।
कल्याणपुर में रहने वाले डॉ. राजेश कुमार और डॉ. राम प्रकाश के मेड लाइफ हॉस्पिटल में डोनर आयुष को भर्ती कराया गया था। डॉ. राजेश और राम प्रकाश पहले कल्याणपुर में आरोही हॉस्पिटल चलाते थे। अस्पताल की शिकायत आने पर डीसीपी वेस्ट एमए आसिम काबिदी ने सीएमओ हरिदत्त नेमी से शिकायत की थी। जिस पर अस्पताल को बंद करा दिया गया था। पुलिस कमिश्नर ने बताया कि करीब 10 दिन पहले ही इन दोनों ने कल्याणपुर में मेड लाइफ हॉस्पिटल शुरू किया था, जो रजिस्टर्ड भी नहीं था।
पुलिस गिरफ्त में आए कानपुर देहात के मूसा नगर निवासी डॉ. नरेंद्र सिंह प्रिया हॉस्पिटल के संचालक हैं। जहां पर किडनी रिसीवर पारुल तोमर को भर्ती कराया गया था। पुलिस कमिश्नर ने बताया कि नरेंद्र पहले नर्सिंग स्टॉफ का काम करता था। इसके बाद उसने हॉस्पिटल खोल लिया था।
एजेंट शिवम अग्रवाल कल्याणपुर के देवी सहाय नगर का रहने वाला है। पारुल के डॉ. अफजल के संपर्क में आने के बाद शिवम को डोनर तलाशने की जिम्मेदारी दी गई थी। पुलिस कमिश्नर ने बताया, पारुल और आयुष का ब्लड ग्रुप बी+ है। शिवम ही गैंग का सरगना है। वह डॉ. प्रीति आहूजा, सुरजीत आहूजा और डॉ. रोहित से संपर्क में था। मरीज से डील तय होने के बाद ही डॉ. रोहित लखनऊ और नोएडा से डॉक्टरों की टीम लेकर ऑपरेशन के लिए कानपुर आते थे।
पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल ने बताया- पूरा सिंडिकेट व्यवस्थित तरीके से काम कर रहा था। गैंग में शामिल डॉ. अफजल अस्पतालों में संपर्क रखता था। लंबे समय से डायलिसिस कराने वालों की जानकारी हासिल करता था।
फिर मरीजों को किडनी ट्रांसप्लांट कराने के लिए संपर्क करता था। इसके बाद टेलीग्राम पर बने ग्रुप में मरीज की जानकारी शेयर की जाती थी। ग्रुप में कई डॉक्टरों के साथ एजेंट भी जुड़े थे। मुजफ्फरनगर निवासी स्कूल संचालक की पत्नी पारुल तोमर से डॉ. अफजल ने ही संपर्क किया था।
पारुल की बीते 8 साल से डायलिसिस चल रही थी। डॉ. अफजल के संपर्क में आने के बाद वह ट्रांसप्लांट के लिए राजी हो गई थी। शुरुआती जांच में सामने आया है कि 80 लाख में पारुल से डील हुई थी। इसके बाद पारुल की डिटेल टेलीग्राम ग्रुप पर भेज दी गई थी। लिखा था- 30 साल की महिला को किडनी की जरूरत है। उनका ब्लड ग्रुप बी+ है। किडनी डोनेट करने वाले को मुंहमांगा दाम मिलेगा। इसके बाद ही एंबुलेंस चालक शिवम अग्रवाल के संपर्क में आयुष आया था।
पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल ने बताया कि डील तय होने के बाद शिवम डॉ. रोहित से संपर्क करता था। रोहित दिल्ली और लखनऊ से अपने 7-8 डॉक्टरों की टीम लेकर कानपुर आता था। इनमें एनीस्थीसिया, सर्जन, मेडिसिन की व्यवस्थाएं रहती थीं।
ऑपरेशन होने के बाद डोनर और रिसीवर को अलग-अलग अस्पतालों में शिफ्ट कर दिया जाता था। वहां 4 से 5 दिन तक उन्हें डॉक्टरों के ऑब्जर्वेशन में रखने के बाद डिस्चार्ज कर दिया जाता था। वहीं जब किसी मरीज को कोई दिक्कत होती थी, तो उसे लखनऊ, दिल्ली स्थित हायर सेंटरों में ट्रांसफर कर दिया जाता था।
पुलिस पूछताछ में शिवम अग्रवाल ने बताया कि आहूजा हॉस्पिटल में अब तक 7 से 8 ऑपरेशन किए गए हैं। इसके साथ ही कानपुर, लखनऊ के करीब 7 अस्पतालों में भी किडनी ट्रांसप्लांट का खेल किया गया है। शिवम ने बताया कि कोई भी ऑपरेशन दिन में नहीं किया जाता था। डोनर और रिसीवर से डील तय होने के बाद उन्हें 3 दिन पहले अस्पताल में भर्ती करा लिया जाता था।
डॉ. रोहित ऑपरेशन का दिन और समय तय करते थे। सभी ऑपरेशन रात के समय ही किए जाते थे। परिवारवाले आनाकानी करते, तो उन्हें डॉक्टर के पास समय न होने का हवाला दिया जाता था। डॉ. रोहित अपने साथ डॉ. वैभव, डॉ. अनुराग, डॉ. अफजल समेत 4-5 अन्य स्टाफ के साथ 2-3 गाड़ियों से आते थे। उनके अस्पताल आने से पहले हॉस्पिटल के सारे सीसीटीवी को बंद कर दिया जाता था।
ऑपरेशन के दिन हॉस्पिटल के स्टॉफ की छुट्‌टी कर दी जाती थी। इस दौरान डॉ. रोहित की टीम के अलावा और कोई भी हॉस्पिटल में नहीं रहता था। ऑपरेशन थिएटर में इस्तेमाल होने वाली दवाएं, मरीज और डोनर की दवाओं की व्यवस्था उनकी ही टीम करती थी।
ऑपरेशन के बाद तड़के डोनर और रिसीवर को अलग-अलग अस्पताल रेफर कर दिया जाता था, जिसकी कोई लिखा-पढ़ी नहीं की जाती थी। डोनर और रिसीवर को शिवम ही अपनी एंबुलेंस के जरिए अलग-अलग अस्पतालों में पहुंचाता था।
कानपुर-लखनऊ के 7 अस्पताल पुलिस की रडार पर
31 मार्च की देर शाम मेड लाइफ हॉस्पिटल को सीज किया गया है, आहूजा हॉस्पिटल को नोटिस दिया गया है। नोटिस के बाद उसे भी सीज किया गया जाएगा। प्रिया हॉस्पिटल में भी नोटिस जारी कर जवाब मांगा गया है।
पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल ने बताया कि शुरुआती जांच में सामने आया कि अब तक कानपुर में 50 से अधिक लोगों का किडनी ट्रांसप्लांट कराया गया है। डॉ. रोहित कानपुर में अन्य जगहों पर भी ऑपरेशन करता रहा है। वह दिल्ली के डॉक्टरों के संपर्क में है। किडनी ट्रांसप्लांट मामले में 7 अस्पताल और रडार में आए हैं। इनमें एक लखनऊ और अन्य 6 कानपुर में हैं। 

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